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Maheshwari Akhada invites Nominations for Divy Awards | Only for Maheshwari People | प्रतिष्ठित माहेश्वरी सम्मान "दिव्य पुरस्कार" के लिए नामांकन आमंत्रित | Divy Awards Are Given On Mahesh Navami

The nomination process of Divy Awards is open to the Maheshwari People. Even self-nomination can be made. Nominations/Recommendations are invited from 1st August to 15th December every year. Nominations and recommendations have been started for the prestigious Maheshwari Awards of Maheshwari Community Divy Awards (Divy Shri, Divy Bhushan, Divy Vibhushan). These Maheshwari Awards have been started by Maheshwari Akhada (whose official name is 'Divyashakti Yogpeeth Akhara'), the highest Gurupeeth of Maheshwari community. This award is given to the recipient by the Peethadhipati of Maheshwari Akhada, who is decorated with the title of Maheshacharya, the highest guru post of Maheshwari community (At the present time Yogi Premsukhanand Maheshwari is the Peethadhipati of Maheshwari Akhada and Maheshacharya). The last date for nominations for the Divy Awards is December 15. These awards are given on Mahesh Navami.

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Nominations and recommendations have also been invited for consideration on a broad basis from national office bearers of Maheshwari social organizations, state officials, Maheshwari Ratna Award winners, Maheshwari institutions/trusts and many other sources.

Nominations and recommendations for Divy Awards can only be made through WhatsApp No. 9405826464 and e-mail maheshwariakhada@gmail.com. All Maheshwari community members can also self-nominate and recommend themselves. Nominations and recommendations should include all relevant details, which should clearly include the distinguished (distinguished/notable) and extraordinary achievements of the nominee, his or her respective field, service etc.

The divine awards are announced every year in the fourth week of December or the first week of January. This award is given for distinguished and extraordinary achievements and services of a Maheshwari individual in all fields and disciplines, such as spirituality, art, education, literature, science, sports, medicine, social work (social service), science and engineering, service, business and industry. Are done. All Maheshwari people without discrimination of race, occupation, position or sex are eligible for these awards.


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प्रतिष्ठित माहेश्वरी सम्मान "दिव्य पुरस्कार" के लिए नामांकन आमंत्रित

'दिव्य विभूषण, दिव्य भूषण और दिव्यश्री' माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च पुरस्कारों में से हैं। यह पुरस्कार "माहेश्वरी अखाड़ा (दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा)" द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तरपर दीये जानेवाले प्रतिष्ठित "माहेश्वरी सम्मान" है। माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार "माहेश्वरी रत्न" के बाद क्रमशः चौथे, तीसरे और दूसरे स्थान पर दिव्यश्री', 'दिव्य भूषण' और 'दिव्य विभूषण' यह श्रेष्ठ पुरस्कार है। इस सम्मान में एक पदक और प्रशस्ति पत्र (सम्मान पत्र) दिया जाता है।

माहेश्वरी अखाड़ा द्वारा प्रदान किये जानेवाले माहेश्वरी समाज के प्रतिष्ठित सम्मान दिव्य पुरस्कारों (दिव्यश्री, दिव्य भूषण, दिव्य विभूषण) के लिए नामांकन और सिफारिशें शुरू की गई है। दिव्य पुरस्कारों के लिए नामांकन की अंतिम तिथि 15 दिसंबर है।

माहेश्वरी समाज-संगठनों के राष्ट्रिय पदाधिकारियों, प्रदेश पदाधिकारियों, माहेश्वरी रत्न पुरस्कार विजेताओं, माहेश्वरी संस्थानों/संस्थाओं/ट्रस्टों और कई अन्य स्रोतों से भी व्यापक आधार पर विचार करने के लिए नामांकन और सिफारिशें आमंत्रित की गई हैं।

दिव्य पुरस्कारों के लिए नामांकन और सिफारिशें केवल WhatsApp No. 9405826464 तथा ई-मेल maheshwariakhada@gmail.com पर प्राप्त की जाएंगी। सभी माहेश्वरी समाजजन स्वयं भी स्व-नामांकन और सिफारिश कर सकते हैं। नामांकन और सिफारिशों में सभी प्रासंगिक विवरण शामिल होने चाहिए, जिसमें स्पष्ट रूप से नामांकित व्यक्ति की प्रतिष्ठित (विशिष्ट/उल्लेखनीय) और असाधारण उपलब्धियां, उनके या उसके संबंधित क्षेत्र, सेवा आदि विवरण शामिल होने चाहिए।

दिव्य पुरस्कारों की घोषणा हर साल दिसंबर के चौथे सप्ताह में अथवा जनवरी के पहले सप्ताह में की जाती है। यह पुरस्कार सभी क्षेत्रों और विषयों, जैसे अध्यात्म, कला, शिक्षा, साहित्य, विज्ञान, खेल, चिकित्सा, सामाजिक कार्य (समाजसेवा), विज्ञान और इंजीनियरिंग, सेवा, व्यापार और उद्योग में माहेश्वरी व्यक्ति के विशिष्ट और असाधारण उपलब्धियों और सेवाओं के लिए प्रदान किये जाते है। स्पर्धा, व्यवसाय, स्थिति या लिंग (race, occupation, position or sex) के भेदभाव के बिना सभी माहेश्वरी लोग इन पुरस्कारों के लिए पात्र हैं।

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दिव्य विभूषण पुरस्कार -
दिव्य विभूषण सम्मान माहेश्वरी समाज का दूसरा सर्वोच्च सम्मान है। जो माहेश्वरी व्यक्ति अपने किसी विशिष्ट क्षेत्र में असाधारण और उत्कृष्ट सेवा करते हैं उनको दिव्य विभूषण दिया जाता है। यह सम्मान समाज के लिये बहुमूल्य योगदान के लिए भी दिया जाता है।

दिव्य भूषण पुरस्कार -
दिव्य भूषण सम्मान माहेश्वरी समाज का तीसरा सर्वोच्च सम्मान है। यह सम्मान किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट और उल्लेखनीय सेवा के लिए प्रदान किया जाता है। इसमें माहेश्वरी समाज के संगठन के पदाधिकारीयों द्वारा की गई सेवाएं भी शामिल हैं।

दिव्यश्री पुरस्कार -
दिव्यश्री या दिव्य श्री सम्मान माहेश्वरी समाज का चौथा सर्वोच्च सम्मान है। दिव्यश्री सम्मान किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए प्रदान किया जाता है। इसमें सरकारी कर्मचारी के तौर पर माहेश्वरी व्यक्ति द्वारा की गई सेवाएं भी शामिल हैं।

Divy Vibhushan — The second highest Maheshwari honour (award).

Divy Bhushan — The third highest Maheshwari honour (award).

Divy Shri — The fourth highest Maheshwari honour (award).

दिव्य पुरस्कार (दिव्यश्री, दिव्य भूषण, दिव्य विभूषण) के बारेमें अधिक जानकारी के लिए इस link पर click कीजिये > माहेश्वरी समाज के प्रतिष्ठित पुरस्कार/सम्मान- दिव्य पुरस्कार

माहेश्वरी समाज की धार्मिक परंपरा के अनुसार धनतेरस के दिन हाथी पूजन का है विशेष महत्व


माहेश्वरी समाज की धार्मिक परंपरा के अनुसार धनतेरस के दिन हाथी की पूजा करने का विधान है। माहेश्वरी धार्मिक मान्यता के अनुसार हाथी को स्वास्थ्य, शक्ति और ऐश्वर्य प्रदाता के रूप में 'गजान्तलक्ष्मी' कहा जाता है। हाथी के पर्याय के रूप में, जिसका सामने का दाहिना पैर आगे हो ऐसे सोने, चांदी, तांबे, पीतल, कांसे या लाल मिट्टी के हाथी को पूजा जाता है। चांदी अथवा पीतल के हाथी को पूजाघर में, हाथी का मुख उत्तर दिशा की ओर करकर रखा जाता है तथा उसकी नित्य पूजा की जाती है।

कहते हैं कि‍ एक बार महाभारत काल में धनतेरस के दिन पूरे हस्‍त‍िनापुर में गजलक्ष्मी पर्व मनाया गया। इस उत्‍सव पर हस्‍तिनापुर की महारानी गांधारी ने पूरे नगर को शाम‍िल होने के ल‍िए आमंत्रित क‍िया था लेक‍िन कुंती को नहीं बुलाया। व‍िधान के अनुसार इसमें मिट्टी के हाथी की पूजा होनी थी। ऐसे में गांधारी के 100 कौरव पुत्रों ने म‍िट्टी लाकर महल के बीच व‍िशालकाय हाथी बनाया। जि‍ससे कि‍ सभी लोग उसकी पूजा कर सके। ऐसे में पूजा में हस्‍तिनापुर की महारानी गांधारी द्वारा न बुलाए जाने से कुंती काफी दुखी थी। ज‍िससे उनके बेटे अर्जुन से मां का दुख देखा नहीं गया। उन्‍होंने मां से कहा क‍ि वह पूजा की तैयारी करें और वह म‍िट्टी का नहीं बल्‍क‍ि जीव‍ित हाथी लेकर आते हैं। फिर अर्जुन ने देवताओं के राजा इंद्र से ऐरावत हाथी को पूजने हेतु भेजने का आवाहन किया। अर्जुन के आवाहन पर इंद्र ने ऐरावत हाथी को अर्जुन के पास भेजा। अर्जुन ने हाथी को मां कुंती के सामने खड़ा कर द‍िया और कहा कि तुम इसकी पूजा करो। कुंती को ऐरावत हाथी की पूजा करते देख गांधारी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्‍होंने कुंती से क्षमा मांगी। इसके बाद से ही गजलक्ष्‍मी के रूपमें हाथी की पूजा शुरू हो गई। तभी से धनतेरस के दिन सजे-धजे सोने, चांदी, तांबे, पीतल, कांसे या लाल मिट्टी के हाथी को पूजने की परंपरा आरंभ हुई। महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी स्वरुप को हाथी के रूपमें पूजा जाने लगा। 

गजलक्ष्मी- महालक्ष्मी के आठ स्वरुप है जिनके अधीन है अष्टसम्पदायें, इन्हे अष्टलक्ष्मी के नाम से जाना जाता है। इन्ही अष्टलक्ष्मीयों में से एक है- गजलक्ष्मी। इन्हीं की कृपा से बल और आरोग्य के साथ साथ धन-वैभव-समृद्धि के साथ ही राजपद का आशीर्वाद प्राप्त होता है; इसीलिए गजलक्ष्मी देवी को राजलक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। गज (हाथी) को वर्षा करने वाले मेघों तथा उर्वरता का भी प्रतीक माना जाता है इसलिए गजलक्ष्मी उर्वरता तथा समृद्धि की देवी भी हैं। इसी गजलक्ष्मी को हाथी के रूपमें गजान्तलक्ष्मी के नाम से पूजा जाता है।


धनतेरस अर्थात धन्वन्तरि तेरस धन्वन्तरि से धन और उनके प्राकट्य का दिन 'तेरस' मिलकर "धनतेरस" शब्द बना है कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का प्राकट्य हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है जिस प्रकार देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थीं, उसी प्रकार आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरी भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं धन्वन्तरि आरोग्य, सेहत, स्वास्थ्य, आयु और तेज के आराध्य देवता हैं (Lord Dhanvantari is God of Health) दीपावली के पांच दिवसीय पर्व का पहला दिन है- धनतेरस इसी दिन से दीपावली पर्व की शुरुवात होती है

धनतेरस की पूजाविधि-
महालक्ष्मी पूजन से 2 दिन पहले आरोग्‍य व दीर्घायु की कामना के साथ धनतेरस पर्व मनाया जाता है, आरोग्यदेव भगवान धन्वन्तरि की पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन स्वास्थ्य के अनुकूल ऐसे रसोई के बर्तन खरीदने की परंपरा है। पीतल धातु भगवान धन्वन्तरि को बहुत प्रिय है, इसलिए धनतेरस के दिन पीतल की चीज़ों का खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। सफाई के लिए नई झाडू और सूपड़ा/सुपली खरीदकर उसकी पूजा की जाती है। इस दिन रसोईघर की साफसफाई की जाती है, रसोई में प्रयोग किये जानेवाले प्रमुख बर्तनो (जैसे की चकला/चकलुटा- यह लकड़ी का बना होता है जिसपर चपाती और रोटी बेली जाती है, बेलन, तवा, कढ़ई आदि) और चूल्हे की (वर्तमान समय में गॅस को ही चूल्हा समझे) पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि धनवंतरी भगवान संध्या काल में प्रकट हुए थे अतः संध्या के समय पूजन किया जाना उत्तम माना जाता है। पूजन में आयुर्वैदिक घरेलु ओषधियाँ जैसे आंवला, हरड़, हल्दी आदि अवश्य रखें। जल से भरे घड़े में हरितकी (हरड़), सुपारी, हल्दी, दक्षिणा, लौंग का जोड़ा आदि वस्तुएं डाल कर कलश स्थापना करें। भगवान धन्वंतरि की पूजा में सात धान्यों की पूजा होती है। जैसे कि गेहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर। इन सब के साथ ही पूजा में विशेष रूप से स्वर्णपुष्पा के पुष्प से माँ दुर्गा का पूजन करना बहुत ही लाभकारी होता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि के साथ ही माँ दुर्गा के पूजा का विशेष महत्व है। धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि को भोग में श्वेत मिष्ठान्न का भोग लगाना चाहिए। आयुर्वेद के देवता धन्वन्तरि के साथ ही योग के देवता भगवान महेश (शिव) और बल (स्वास्थ/शक्ति) की देवता महाकाली (देवी दुर्गा) का पूजन भी किया जाता है। धनतेरस पर हाथी की पूजा करने का भी विधान है। धनतेरस की संध्या (शाम) को यम देवता के नाम पर दक्षिण दिशा में एक दीप जलाकर रखा जाता है।

आरोग्य रूपी धन से सम्बंधित है धनतेरस, ना की सोना-चांदी-हिरे-जवारात रूपी धन से लोग धनतेरस के दिन को सोने-चांदी के गहने/अलंकार खरीदने का शुभ दिन समझने लगे है और इसीलिए इस दिन धन अर्थात रूपया-पैसा, सोने-चांदी के गहने/अलंकार आदि खरीदते है तथा कुबेर और रूपया-पैसा, सोने-चांदी के गहनों की पूजा करते है लेकिन वस्तुतः रूपया-पैसा-सोना-चांदी-हीरे-जवारात रूपी धन की पूजा के लिए महालक्ष्मी-पूजन (दीपावली) का दिन है, धनतेरस का नहीं 

धनतेरस का पर्व स्वास्थ्य के प्रति समर्पित दिन होने के कारन इस दिन स्वास्थ्य साधनों के उपकरण (Health Instrument, Exercise & Fitness Instrument) खरीदने चाहिए तथा इनकी पूजा की जानी चाहिए; स्वास्थ्य से सम्बंधित सेमीनार, कार्यशाला, चिकित्सा शिबिर (हेल्थ कैंप), गोष्टी आदि का आयोजन किया जाना चाहिए, यही धनतेरस की मूल भावना के अनुरूप, संयुक्तिक और औचित्यपूर्ण है। हमें यह समझने की जरुरत है की- धनतेरस के दिन को स्वास्थ्य के दिन के रूप में भूलकर/भुलाकर इसके कुबेर पूजन और सोने-चांदी के गहने/अलंकार खरीदने के दिन के रूप में प्रचारित होने से ना केवल इस दिन की मूलभावना, मूल उद्देश्य समाप्त होता है बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवनदर्शन को दर्शानेवाले इस पर्व की सार्थकता और औचित्य ही समाप्त हो जाता है। यह भारतीय संस्कृति की बहुत बड़ी हानि है।

धनतेरस का सन्देश यही है की इस दिन अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग होना है, जीवन में स्वास्थ्य के महत्त्व को समझना है, आनेवाले समय में अपने स्वास्थ्य को सुनिश्चित करना है, अपने बेहतर स्वास्थ्य का नियोजन करना है और भगवान धन्वन्तरि से प्रार्थना करनी है कि वे समस्त जगत को निरोग कर मानव समाज को दीर्घायु प्रदान करें।





जैसे राजपूत माने शेर (Loin), जैसे सिख माने बाघ (Tiger)
वैसे ही माहेश्वरी माने "हाथी" (Elephant)

- भगवान महेशजी की संतान गणेशजी का मुख (Face) हाथी का है और माहेश्वरी खुद को भगवान महेशजी की संतान मानते है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- 'शेर' की तरह अपना पेट भरने के लिए किसी और को जान से नहीं मारता है हाथी ; यही माहेश्वरी संस्कृति है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- शक्तिशाली होनेपर भी आम तौर पर हाथी शांतिप्रिय होता है लेकिन अगर बिफर जाये तो फिर सामनेवाले को कुचलकर रख देता है. हाथी से तो राजा कहलानेवाला शेर भी खौफ खाता है. यही है माहेश्वरी attitude... इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- हाथी को 'समृद्धि और ऐश्वर्य' का प्रतिक माना जाता है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी" 
So, Elephant is a Maheshwari symbol of lifestyle.

Mahesh Navami Logo | Mahesh Navami Symbol | Mahesh Navami Date | Mahesh Navami 2026 | Mahesh Navami Significance | Maheshwari Samaj

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"महेश नवमी उत्सव" का मानचिन्ह (LOGO)  
The logo for 'Mahesh Navami Festival' 

"महेश नवमी उत्सव" के मानचिन्ह (LOGO) के इस PNG file/printing quality फोटो को आप Download कर के इसे महेश नवमी कार्यक्रम पत्रिका, स्टिकर तथा शुभकामना बैनर के लिए प्रयोग (Use) करे l इससे एक अच्छा उत्सवपूर्ण माहौल बनेगाl

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मित्रों, आप स्काई ब्लू, लाइट यलो अथवा व्हाइट कलर के टी-शर्ट लेकर इस "महेश नवमी उत्सव" के मानचिन्ह (LOGO) के PNG file/printing quality डिझाइन को Download करके, अपने वहाँ पर ही टी-शर्ट पर प्रिंट करवा सकते हैl "महेश नवमी उत्सव" के मानचिन्ह (LOGO) को बड़े साइज (लगभग 8 इंच x 8 इंच) में टी-शर्ट के बॅक साइड में (पीठ पर) प्रिंट करवाएl टी-शर्ट के सामने के साइड में (फ्रंट में), बाये (लेफ्ट) साइड में 3 इंच x 3 इंच साइज में प्रिंट करवाएl महेश नवमी उत्सव के निमंत्रण-पत्रिका/कार्यक्रम-पत्रिका पर, महेश नवमी शुभकामना बैनर पर भी आप इसे छपवा सकते हैl
   
"महेश नवमी उत्सव" के मानचिन्ह (LOGO) के high-resolution file की आवश्यकता हो अथवा इस सन्दर्भ में कोई टेक्निकल समस्या हो तो 9405826464 इस मोबाइल नंबर पर WhatsApp संपर्क करेंl

आप सभी को और आपके परिवारजनों को महेश नवमी (माहेश्वरी वंशोत्पत्ति दिन/माहेश्वरी स्थापना दिवस) की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक मंगलकामनाएं! आप सभी पर भगवान महेशजी और माता पार्वती की कृपा सदैव बनी रहेl आपका जीवन मंगलमय-सुखमय हो, दाता आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ आयु तथा सुख समृद्धि प्रदान करें....!!!
जय महेश !

जैसे राजपूत माने शेर (Loin), सिख माने बाघ (Tiger), वैसे ही माहेश्वरी माने "हाथी" (Elephant)




- भगवान महेशजी की संतान गणेशजी का मुख (Face) हाथी का है और माहेश्वरी खुद को भगवान महेशजी की संतान मानते है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- 'शेर' की तरह अपना पेट भरने के लिए किसी और को जान से नहीं मारता है हाथी ; यही माहेश्वरी संस्कृति है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- शक्तिशाली होनेपर भी आम तौर पर हाथी शांतिप्रिय होता है लेकिन अगर बिफर जाये तो फिर सामनेवाले को कुचलकर रख देता है. हाथी से तो राजा कहलानेवाला शेर भी खौफ खाता है. यही है माहेश्वरी attitude... इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

- हाथी को 'समृद्धि और ऐश्वर्य' का प्रतिक माना जाता है इसलिए माहेश्वरीयो का प्रतिक है "हाथी"

So, Elephant is a Maheshwari symbol of lifestyle.



Mahesh Navami Theme Poster Launch by Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari, Peethadhipati Maheshwari Akhada | Brief Intro to Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari Maharaj | महेशाचार्य प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज का संक्षिप्त परिचय | Mahesh Navami Significance

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Mahesh Navami theme poster has been released (Theme Poster Launch) by Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari Maharaj (Peethadhipati- Maheshwari Akhada, Which is also written as Maheshwari Akhara in English) to elevate the proud identity of Maheshwari community and every Maheshwari person. It is hoped that every Maheshwari will post and share this poster on social media, Facebook, Maheshwari WhatsApp groups etc. Also in this post you will know the brief introduction of Maheshacharya Premsukhanand Maheshwari Maharaj, the peethadhipati of Maheshwari Gurupeeth "Maheshwari Akhada" and the supreme samajguru of Maheshwari community, in Hindi and English.

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महेश नवमी थीम पोस्टर का विमोचन (थीम पोस्टर लॉन्च) महेशाचार्य प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज (पीठाधिपति, माहेश्वरी अखाड़ा) द्वारा किया गया है, जो माहेश्वरी समाज और प्रत्येक माहेश्वरी बंधू, माता-बहनों के गौरवपूर्ण पहचान को बुलंद करने हेतु है। आशा है कि हरएक माहेश्वरी इस पोस्टर को सोशल मीडिया, फेसबुक, माहेश्वरी WhatsApp groups आदि पर पोस्ट और शेयर करेंगे।

साथ ही इसी पोस्ट में आप जानेंगे हिंदी और इंग्लिश में माहेश्वरी गुरुपीठ के पीठाधिपति एवं माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च समाजगुरु महेशाचार्य प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज का संक्षिप्त परिचय।

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महेश नवमी थीम विशेष के बारे में
महेशाचार्य प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज के साथ देशभर के माहेश्वरी समाज के अनेको कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों से हुए विचार-विमर्श से यह निर्णय लिया है की हर एक महेश नवमी एक विशेष थीम पर मनाई जानी चाहिए, उस थीम के अनुरूप एक बैनर पोस्टर बनाया जाना चाहिए और एक साथ पूरे देश भर में उसका प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए। तय किये गए थीम के अनुरूप ही महेश नवमी के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। हर वर्ष एक विशेष थीम के साथ, एकसाथ पुरे विश्व का माहेश्वरी समाज महेश नवमी उत्सव मनाएगा तो इससे समाज में एक अच्छा माहौल बनेगा, समाज में एकता की भावना बढ़ेगी, संगठन में एक सुसूत्रता आएगी और समाज में एक नयी ऊर्जा का, चेतना का संचार होगा।

वर्ष 2026 के लिए वह थीम होगी-

जानो अपनी जड़ों और विरासत को
क्यों है हम "माहेश्वरी" इस बात को!!


इस उपरोक्त थीम के तहत देश भर में महेश नवमी के कार्यक्रमों में यह बताया जाए कि, हम माहेश्वरी क्यों कहलाते हैं? माहेश्वरी नाम हमें किसने दिया? कब दिया? क्यों दिया? माहेश्वरी उत्पत्ति की पारंपरिक कथा क्या है? माहेश्वरी उत्पत्ति के समय भगवान महेश ने माहेश्वरी समाज को क्या उपदेश दिया था? क्या वरदान दिए थे? माहेश्वरी संस्कृति क्या है? महेश नवमी को क्यों बड़ी तीज से भी बड़ा, माहेश्वरी समाज का सबसे बड़ा धार्मिक त्योंहार माना जाता है?

माहेश्वरी समाज जिस दिन अस्तित्व में आया उसी तिथि को हम महेश नवमी का उत्सव मनाते हैं तो उपरोक्त बातों की जानकारी समाजजनों को हो और भविष्य में भी समाज का अस्तित्व और विशिष्ट पहचान बनी रहे, समाजजनों में आपसी एकता मजबूत बने, समाजजनों में आपसी सहयोग की भावना बढ़ें इसके लिए यह जानकारी समाज के लोगों को होना काफी लाभकारी होगा और यह जरुरी भी है। इससे स्वाभाविक रूप से माहेश्वरीयों की आपसी एकता दृढ़ होगी। आपसी एकता द्रिढ होगी तो एक दूसरे के लिए सहयोग की भावना बढ़ेगी, सहयोग की भावना बढ़ेगी तो प्रगति होगी। समाज के सामने जो समस्याएं है, चुनौतियां है उन्हें एकसाथ मिलकर सुलझाने में, दूर करने में मदत मिलेगी। परिणामतः समाज का वर्तमान बेहतर होगा साथ ही भविष्य सुरक्षित होगा।

माहेश्वरी संस्कृति का गौरव बढ़ाने के लिए, माहेश्वरी समाज की विशिष्ट पहचान को बुलंद करने के लिए, माहेश्वरी समाज के पुनरुत्थान के लिए हमारे द्वारा किए जा रहे प्रयास को, कोशिश को आप सराहना चाहते हो, साथ देना चाहते हो तो बस इस फोटो और पोस्ट को कॉपी पेस्ट करके सोशल मीडिया पर और माहेश्वरी व्हाट्सएप ग्रुप्स में पोस्ट करें, शेयर करें।


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Brief introduction of Maheshacharya Yogi Premsukhanand Maheshwari Maharaj, in English —


Maheshacharya (Hindi: महेशाचार्य) is the position of the top religious leadership of the Maheshwari community. The title "Maheshacharya" is used for the head/peethadhipati of the "Maheshwari Akhara", the highest gurupeeth of the Maheshwari community. Presently, Yogi Premsukhanand Maheshwari Maharaj (Former name- Premsukh Sabu) is working as Maheshacharya.

According to the traditional belief of Maheshwari community passed down from generation to generation, in 3133 BC, Lord Mahesha (Lord Shiva) and Goddess Parvati themselves gave origin to a new clan by the name of Maheshwari clan, a new community by the name of Maheshwari community (the origin of Maheshwari community can also be seen as the establishment of Maheshwari community). According to the Indian calendar, this incident occurred on the ninth day of the Shukla Paksha of the month of Jyeshtha. Lord Mahesha is the originator of Maheshwari community, hence people of Maheshwari community celebrate this date every year with great pomp and show in the name of Mahesh Navami and as the biggest festival of Maheshwari community. At the same time, Lord Mahesha also appointed 6 Gurus as Samajguru to guide the Maheshwari community, which is mentioned in the origin story of the Maheshwari community.

To ensure that the system of this Samajguru and Maheshwari Gurupeeth, which guides the Maheshwari community, runs continuously and smoothly, these Maheshwari Samajgurus established the Maheshwari Gurupeeth and the peethadhipati of the Maheshwari Gurupeeth was officially honoured with the title of Maheshacharya. Since then, the title Maheshacharya is officially used for the supreme guru of the Maheshwaris and the head/peethadhipati of the Gurupeeth of the Maheshwari community. In the year 2008, this Maheshwari Gurupeeth was legally registered in the name of "Divyshakti Yogpeeth Akhada".

At present, the official name of the Gurupeeth of Maheshwari community is Divyashakti Yogapeeth Akhara but it is famous by the name of Maheshwari Akhara. The first peethadhipati of the Maheshwari Gurupeeth is Maharishi Parashar, hence Maharshi Parashar is Adi Maheshacharya. The peethadhipati of the successive series of peethadhipati of the Maheshwari Gurupeeth since his time is known by the title of Maheshacharya. This position is considered the highest honor in the Maheshwari community. Currently, Yogi Premsukhanand Maheshwari Maharaj serves as the Peethadhipati of the Divyashakti Yogapeeth Akhara (Maheshwari Akhada) and Maheshacharya. On the occasion of Mahesh Navami, the origin day of Maheshwari community, Maheshacharya addresses the Maheshwari community with a special address in which guidance is given regarding the future roadmap of the community. This special address given by Maheshacharya on Mahesh Navami is considered very important in the Maheshwari community.

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महेशाचार्य का संक्षिप्त परिचय हिंदी में 
महेशाचार्य (अंग्रेज़ी: Maheshacharya), यह माहेश्वरी समाज के शीर्ष धार्मिक नेतृत्व (सर्वोच्च माहेश्वरी समाजगुरु) का पद है। माहेश्वरी समाज के सर्वोच्च गुरुपीठ "माहेश्वरी अखाड़ा" के पीठाधिपति के लिए "महेशाचार्य" उपाधि का प्रयोग होता है। वर्तमान में योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज (पूर्ववर्ती नाम- प्रेमसुख साबु) महेशाचार्य के रूप में कार्यरत हैं।

माहेश्वरी समाज की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परंपरागत मान्यता के अनुसार, ईसवी सन पूर्व 3133 में स्वयं भगवान महेशजी (भगवान शिव) और देवी पार्वती ने माहेश्वरी वंश के नाम से एक नए वंश की, माहेश्वरी समाज के नाम से एक नए समाज की उत्पत्ति की थी (माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति को माहेश्वरी समाज की स्थापना के रूप में भी देखा जा सकता है)। यह घटना भारतीय कैलेण्डर के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को घटित हुई थी। माहेश्वरी समाज के उत्पत्तिकर्ता भगवान महेश है इसलिए माहेश्वरी समाज के लोग प्रतिवर्ष इसी तिथि को महेश नवमी के नाम से तथा माहेश्वरी समाज के सबसे बड़े त्योंहार के रूप में बड़े धूमधाम से मनाते है। इसी समय भगवान महेशजी ने माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करने के लिए 6 गुरुओं की भी नियुक्ति की थी, माहेश्वरी समाज के लिए समाजगुरु बनाये थे, जिसका उल्लेख माहेश्वरी समाज उत्पत्ति कथा में आता है।

माहेश्वरी समाज को मार्गदर्शित करनेवाली यह समाजगुरु एवं माहेश्वरी गुरुपीठ की व्यवस्था सतत और सुचारु रूप से चले इसलिए इन्ही माहेश्वरी समाजगुरूओं ने माहेश्वरी गुरुपीठ की स्थापना की और माहेश्वरी गुरुपीठ के मुखियां/पीठाधिपति को आधिकारिक रूप से "महेशाचार्य" की उपाधि से अलंकृत किया गया। तबसे माहेश्वरीयों के सर्वोच्च गुरु और माहेश्वरी समाज के गुरुपीठ के पीठाधिपति के लिए आधिकारिक रूप से महेशाचार्य उपाधि का प्रयोग होता है। वर्ष 2008 में इसी माहेश्वरी गुरुपीठ को क़ानूनी रूप से "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" के नाम से पंजीकृत किया गया है।

वर्तमान समय में माहेश्वरी समाज के गुरुपीठ का आधिकारिक नाम "दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा" है लेकिन यह "माहेश्वरी अखाड़ा" के नाम से प्रसिद्ध है। माहेश्वरी गुरुपीठ के प्रथम पीठाधिपति महर्षि पराशर है इसलिए महर्षि पराशर "आदि महेशाचार्य" है। उनके समय से चले आ रहे माहेश्वरी गुरुपीठ के पीठाधिपतियों की क्रमिक श्रृंखला के पीठाधिपति को "महेशाचार्य" के उपाधि से जाना जाता है। यह पद माहेश्वरी समाज का सर्वोच्च गौरवमयी पद माना जाता है। वर्तमान में योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी महाराज दिव्यशक्ति योगपीठ अखाड़ा (माहेश्वरी अखाड़ा) के पीठाधिपति और महेशाचार्य के रूप में कार्यरत हैं। माहेश्वरी समाज के उत्पत्ति दिवस महेश नवमी के अवसर पर महेशाचार्य माहेश्वरी समाज को विशेष सम्बोधन से सम्बोधित करते है जिसमें समाज के भविष्य के रोडमैप को लेकर मार्गदर्शित किया जाता है। महेश नवमी पर महेशाचार्य द्वारा दिए जानेवाले इस विशेष सम्बोधन को माहेश्वरी समाज में काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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सोशल मिडिया के लिए माहेश्वरी थीम प्रोफाइल पिक / DP फोटो

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"माहेश्वरी उत्पत्ति एवं संक्षिप्त इतिहास" पुस्तक के कुछ मुख्य अंशों को पढ़ने के लिए इस Link पर click कीजिये > The Book, Maheshwari - Origin And Brief History | Author - Yogi Premsukhanand Maheshwari | माहेश्वरी - उत्पत्ति और संक्षिप्त इतिहास, योगी प्रेमसुखानन्द माहेश्वरी द्वारा लिखित पुस्तक